कछुए से भी धीमी है जांच की रफ्तार, छः महीनों में ईला से नहीं पहुंची पत्थलगांव तक,आक्रोशित ग्रामीण आंदोलन की तैयारी में
पत्थलगांव। ग्राम पंचायत ईला में वित्तीय अनियमितता और भ्रष्टाचार की जांच करीब छः महीनों बाद भी पूरी नहीं हो सकी है। इससे जांच में लीपापोती का संदेह गहराने लगा है। लोगों ने इसे लेकर जनपद पंचायत और जांच दल की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।
ग्राम पंचायतों में वित्तीय अनियमितता अब कोई नई बात नहीं रह गई है। परंतु अब गड़बड़ियों के साथ ही उनकी जांच पर भी सवालिया निशान उठने लगे हैं। ताजा मामले में ग्राम पंचायत ईला में वित्तीय गड़बड़ियों की जांच सवालों के घेरे में है। यहां के ग्रामीण पंचायत में हुई गड़बड़ियों की जांच को लेकर फरवरी माह से आंदोलनरत हैं। ग्रामीणों ने वित्तीय वर्ष 2024-25 में पंचायत में बिना निर्माण कार्य कराए ही चबूतरा निर्माण कार्य - 1 लाख, पछरी निर्माण कार्य - 2 लाख 60 हजार, सीसी रोड निर्माण कार्य - 1 लाख का बिना निर्माण के ही सरपंच एवं सचिव की मिलीभगत कर आहरण कर लेने का आरोप लगाते हुए बार - बार शिकायत दर्ज कराई है। जनपद के मुख्य कार्यपालन अधिकारी के साथ ही उच्चाधिकारियों तक ग्रामीण इसे लेकर अपनी शिकायत पहुंचा चुके हैं। शिकायतों के बाद जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी द्वारा जांच दल का गठन तो कर दिया गया परंतु तीन अनियमितताओं की शिकायत छः माह बाद भी पूरी नहीं हो सकी है। शिकायतकर्ता बिरंची यादव और उनके साथी ग्रामीणों ने बताया कि उनके द्वारा धरना प्रदर्शन के बाद जांच समिति का गठन तो किया गया परंतु जांच की रफ्तार कछुए की चाल से भी धीमी है। उन्होंने बताया कि वी राठौर के सीईओ रहते हुए फरवरी मार्च के महीने से उनके द्वारा शिकायतें की जा रही हैं। जांच दल के द्वारा ग्रामीणों के बयान और मौका निरीक्षण करने के लिए कई बार गांव का भ्रमण तो किया परंतु जांच रिपोर्ट अब तक जमा नहीं हो सकी है और वे अभी तक इसके पूरा होने की बाट जोह रहे हैं। इससे ग्रामीणों ने जांच में लीपापोती का संदेह जताया है। उनका कहना है कि महीनों के बाद भी रिपोर्ट जमा नहीं होने से ऐसा प्रतीत होता है कि जानबूझकर जांच को लटकाया जा रहा है। ग्रामीणों ने बताया कि यदि जल्द ही जांच पूरी कर इस पर कार्रवाई नहीं की जाती है तो उन्हें एक बार फिर से आंदोलन करने को मजबूर होना पड़ेगा। परंतु पंचायत के लोगों के लिए शासन के द्वारा दी जा रही राशि के गबन को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सीईओ प्रियंका रानी गुप्ता से इस मामले में वस्तुस्थिति जानने के लिए संपर्क करने का प्रयास किया गया परंतु संपर्क नहीं हो सका।
उठे सवाल
जानकारों ने जांच में हो रही लेट लतीफी को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि शासन द्वारा वित्तीय प्रबंधन में पारदर्शिता लाने और गड़बड़ी रोकने के लिए कडे़ नियम और कानून बनाने के बाद भी पंचायतों में काम करने वाले कर्मचारी एवं जनप्रतिनिधि मिलीभगत से शासकीय राशि का दुरूपयोग कर लेते हैं। परंतु इसके लिए जितने जिम्मेदार पंचायत के कर्मचारी व जनप्रतिनिधि हैं उतने ही जिम्मेदार इन पर नजर रखने वाली संस्थाएं भी हैं जिनमें प्राथमिक स्तर पर जनपद पंचायत शामिल है। उनका कहना है कि जनपद पंचायत में कई स्तरों पर निरीक्षण एवं नियंत्रण की व्यवस्था होने के बावजूद पंचायत में वित्तीय गड़बड़ियों का हो जाना जनपद के कर्मचारियों की कार्यप्रणाली को स्वतः ही सवालों के घेरे में ला खड़ा करता है। जानकारों की मानें तो जनपद के जिम्मेदार अधिकारी एवं कर्मचारी पहले या तो जानबूझकर अनियमितताओं की अनदेखी करते हैं या फिर लापरवाही बरतते हैं जिससे पंचायत में गड़बड़ी किया जाना आसान हो जाता है। और फिर यदि इन गड़बड़ियों की शिकायत ग्रामीणों द्वारा की जाए तो जांच का जिम्मा भी जनपद के ही अधिकारियों और कर्मचारियों पर ही होता है। ऐसे में स्वयं के ही नियंत्रण वाले कार्यों में गड़बड़ी की जांच किस प्रकार होती होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।





